साल था १७०१।
मुगल सल्तनत में तख्तापलट हो चुका था। पुराना बादशाह मर चुका था और उसकी जगह एक और क्रूर और हवस से भरा शासक बैठ गया था। उसका नाम था नवाब शाहबाज खान। वह औरंगजेब के खून से तो नहीं था, लेकिन उसकी हवस उससे कई गुना ज्यादा थी।
जब शाहबाज खान को बस्तीलैंड की खबर मिली कि वहाँ की औरतें पहले से ही मुगल सिपाहियों की चुदाई के लिए उपलब्ध हैं, तो उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने तुरंत नया फरमान जारी किया।
नए और क्रूर नियम
नए फरमान में साफ लिखा था:
- बस्तीलैंड की हर १८ से ३५ साल की औरत को हफ्ते में कम से कम तीन रात मुगल चौकी पर हाजिर होना होगा।
- किसी भी सिपाही को किसी भी औरत की चूत, गांड या मुँह का इस्तेमाल करने का पूरा हक होगा।
- पति अगर विरोध करेगा तो उसे अपनी पत्नी की चुदाई खुद अपनी आँखों से देखनी होगी, और उसके बाद उसकी भी गांड मारी जाएगी।
- जो औरत मना करेगी, उसकी चूत में मिर्च भरकर चौक में नंगा घुमाया जाएगा।
यह फरमान सुनते ही बस्तीलैंड के मर्दों में गुस्सा भड़क उठा। सालों से उनकी औरतों की चूत मुगलों की जागीर बनी हुई थी। अब यह नया शासक और भी नीचे गिराने पर तुला था।
बस्तीलैंड का अस्थायी विद्रोह
गाँव के कुछ युवा मर्दों ने मिलकर फैसला किया कि अब काफी हो चुका। उन्होंने रात के अंधेरे में मुगल चौकी पर हमला कर दिया। तीन सिपाही मारे गए, बाकी भाग निकले।
सुबह होते-होते बस्तीलैंड वालों ने चौकी पर अपना झंडा गाड़ दिया। उन्होंने घोषणा की:
“अब कोई मुगल हमारी औरतों की चूत नहीं छूएगा। यह जमीन हमारी है, ये चूतें हमारी हैं!”
कुछ दिनों तक गाँव में एक अजीब उत्साह था। मर्द फिर से अपनी पत्नियों को सिर्फ अपने लंड से चुदाई करवा रहे थे। कुछ औरतों ने राहत की साँस ली। कुछ को पुरानी आदत हो चुकी थी इसलिए उन्हें थोड़ा अजीब भी लग रहा था।
लेकिन यह आज़ादी ज्यादा दिन नहीं टिकी।
वापसी और कत्लेआम
नवाब शाहबाज खान ने जब खबर सुनी तो वह गुस्से से पागल हो गया। उसने पाँच सौ सैनिकों का जत्था भेजा।
वे सुबह से पहले गाँव में घुस गए। जितने मर्द हथियार उठा सकते थे, उन्हें मौके पर ही काट दिया गया। बाकी मर्दों को बाँधकर चौक में घुटनों के बल बैठा दिया गया।
फिर शुरू हुई असली सजा।
सिपाहियों ने गाँव की लगभग हर जवान औरत को नंगा खींचकर चौक में इकट्ठा किया। उनके पतियों को सामने बैठाकर उनकी आँखें खुली रखने का हुक्म दिया गया।
एक-एक करके औरतों की चुदाई शुरू हुई।
कुछ को चार सिपाही मिलकर पकड़े हुए थे। एक लंड मुँह में, एक चूत में, एक गांड में और चौथा इंतज़ार में खड़ा था। औरतों की चीखें पूरे गाँव में गूँज रही थीं। कई औरतों की चूत से खून निकलने लगा, लेकिन सिपाही रुकने वाले नहीं थे।
एक सिपाही चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, “ये लो अपनी आज़ादी का मज़ा! अब हर चूत मुगल की जागीर है!”
पूरी दोपहर और शाम यह सिलसिला चला। जब अंधेरा हुआ तब तक ज्यादातर औरतों की चूत और गांड सूजी हुई, लाल और Cum से लबालब भरी हुई थीं। कई बेहोश पड़ी थीं। कई रोते हुए अपने पतियों के पास रेंगकर गईं, लेकिन पति खुद अपमान से गड़े जा रहे थे।
हमेशा के लिए गुलामी
उस रात के बाद बस्तीलैंड की आज़ादी हमेशा के लिए खत्म हो गई।
नवाब ने नया इंतजाम किया। अब गाँव में स्थायी रूप से पच्चीस सिपाही रहेंगे। हर हफ्ते नई-नई औरतों की लिस्ट बनेगी जो चौकी पर “सेवा” के लिए आएंगी।
मस्जिद में अब खुलेआम यह सिखाया जाने लगा कि काफिर औरतों की चुदाई करना न सिर्फ जायज़ है, बल्कि पुण्य का काम है। मौलवी साफ कहते थे, “इनकी चूत पर कब्ज़ा करना इनके धर्म पर कब्ज़ा करना है।”
बस्तीलैंड के मर्द अब सिर्फ खेती करते थे और चुपचाप देखते थे कि उनकी औरतें रात भर मुगल लंड के नीचे कराह रही हैं।
कुछ मर्दों ने अपनी पत्नियों को खुद सिपाहियों के आगे पेश करना शुरू कर दिया ताकि उन्हें थोड़ी सुरक्षा मिल सके। कुछ औरतें अब बिना बताए खुद चौकी की तरफ चल देती थीं क्योंकि विरोध करने का नतीजा उन्होंने देख लिया था।
गाँव की हवा में अब हमेशा दो ही चीजें घुली रहती थीं — खेतों की मिट्टी की खुशबू… और चुदाई की गंध।
बस्तीलैंड अब सिर्फ नाम का गाँव रह गया था। असल में वह एक बड़ी खुली वेश्यालय बन चुका था, जहाँ हर चूत पर मुगल सल्तनत का कब्ज़ा था।
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